भूख से मरी बच्चियों की याद में Other, उपभोक्ता संरक्षण

शिखा, मानसी और पारुल के नाम आजाद भारत का इतिहास यकीनन अपने पन्नों में दर्ज नहीं करेगा। उसे सिर्फ नायकों, खलनायकों और विदूषकों का लेखा-जोखा रखने की बुरी आदत है।

आप सोच रहे होंगे कि रविवार की सुबह मैं किन लोगों की राम कहानी लेकर बैठ गया। बता दूं, दिल्ली के मंडावली इलाके में ये तीन बच्चियां इस बीतते हफ्ते की शुरुआत में अचानक दम तोड़ गईं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पता चला कि उनके पेट में अन्न का एक दाना तक न था। मतलब साफ है। भोजन के सांविधानिक अधिकारों से लैस इन अबोधों को कई दिनों से पेट भरने के लिए कुछ भी हासिल नहीं हुआ था। शब्दकोशों में दर्ज ‘भूख’ के अर्थ से अनजान ये अभागिनें जन्म के क्षण से उसे जीने और उसी की वजह से मौत के हवाले होने को अभिशप्त थीं।

ये बच्चियां जब अकाल मृत्यु की लाचारी जी रही थीं, तब इनकी जीर्ण-शीर्ण झोपड़ी में सिर्फ मानसिक रूप से कमजोर मां थी। एक तो दिमागी कमजोरी और दूसरे पश्चिम बंगाल की मूल निवासी होने की वजह से भाषाई लाचारी, वह समझ ही न सकी कि इस भयावह संकट से कैसे पार पाया जाए! मौत की अनंत अंधी खोह में दाखिल होती इन बच्चियों को उस वक्त पिता मंगल का साथ भी नसीब न था। वह हतभागी काम की तलाश में दिल्ली की सड़कों पर भटक रहा था। मंगल दो साल पहले रोटी-रोजगार की तलाश में पश्चिम बंगाल स्थित अपना घर-गांव छोड़कर दिल्ली आया था। कुछ और नहीं मिला, तो रिक्शा चलाने लगा। एक दिन वह रिक्शा भी लुटेरों ने लूट लिया। एक तरफ आमदनी का जरिया बंद हो गया, तो दूसरी तरफ रिक्शा मालिक पैसे वापसी के लिए जोर-जबरदस्ती पर आमादा था। किराया न दे पाने की स्थिति में मकान मालिक ने उसे घर से निकाल दिया था। बेघर और बेरोजगार मंगल के पास अपने छोटे से कुटुंब को देने को कुछ न रह बचा था। 

कौन कहता है कि दिल्ली पूरे देश का ख्याल रखती है? शायद मेरी तरह आपके मन में भी ये सवाल चुभ रहे हों- क्या यही है विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की हकीकत? पश्चिम बंगाल की ‘लोकप्रिय’ नेता ममता बनर्जी की हुकूमत का क्या यही सच है कि वहां से लोग विस्थापित होने को मजबूर हैं? अब कोई भूख से न मरे, इसके लिए क्या कोई राजनेता पूरे देश में पहल करेगा? गुरुवार को कुछ सांसदों  ने संसद में यह मामला उठाया जरूर, पर चर्चा भूख की बजाय सियासी रंगत में रंगी रही। इस चर्चा के बाद केंद्र सरकार ने इस मामले में जांच बैठा दी है। दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया ने फरमाया है कि यह समूचे सिस्टम की विफलता है। इस पर काम करने की जरूरत है।

हमारे ‘माननीय’ ऐसे त्रासद मुद्दों पर एका क्यों नहीं प्रदर्शित करते? विधान मंडलों की उन्मादी बहस और बहिर्गमन में व्यस्त हमारे ‘माननीयों’ को भूलना नहीं चाहिए कि दिल्ली सरकार के जिन डॉक्टरों ने उन बच्चियों का पोस्टमार्टम किया, वे यह देखकर चकित थे कि उनके शरीर में फैट की मात्रा शून्य पर पहुंच गई थी। यानी पेट में अन्न का दाना न जाने पर उनके फैट ने उन्हें कुछ दिन जिंदा रखा और जब यह फैट भी चुक गया, तो वे कोमा में चली गईं। डॉक्टरों ने बाद में संवाददाताओं को बताया कि तीनों बच्चियों का सिर्फ पिंजर रह गया था। दो, चार और आठ बरस की इन बालिकाओं को ऐसी मौत क्यों नसीब हुई? इसका जवाब कौन देगा?

कभी ऐसे फोटो हम अफ्रीका में भूख से मरते बच्चों के देखा करते थे। अब यह हमारे बीच का शर्मनाक यथार्थ हो गया। ये पंक्तियां लिखे जाने तक मंगल नदारद था। यह जानते और मानते हुए भी कि ये अबोध मौतें भूख की वजह से हुईं, पुलिस ने उनका दोबारा पोस्टमार्टम कराया। वे गरीब-गुरबों की मौत को भी शक-शुबहे से देखें, हमें ऐतराज नहीं, पर क्या कोई इस बात का जवाब देगा कि मंगल से रिक्शा लूटने वालों को पकड़ने की जिम्मेदारी किसकी थी? गरीब को गरीबी तरह-तरह से मारती है। 

भरोसा न हो, तो इन आकड़ों पर दृष्टि डाल देखिए। हमारे देश में कुपोषण से हर रोज तीन हजार बच्चे दम तोड़ जाते हैं। यहां कुपोषण और भूख का अंतर समझा दूं। चतुर सरकारें देश-दुनिया को यह बताने में लजाती हैं कि भूख से मौत आज भी हमारी कड़वी हकीकत है। इसीलिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट हमेशा कहती है कि मृतक पर मौत ने झपट्टा कुपोषण की शक्ल में मारा। 

यहां जान लेना जरूरी है कि प्रति एक हजार पर 34 शिशु मां के गर्भ में ही दम तोड़ देते हैं। नौ लाख से अधिक बच्चे पांच साल से कम उम्र में दुनिया को अलविदा कह चुके होते हैं। इस देश में लगभग 19 करोड़ लोग हर रोज भूखे पेट सोने को अभिशप्त हैं। 
कालाहांडी से लेकर दिल्ली तक भूख से मौत तल्ख हकीकत है, हम उससे कब तक मुंह चुराएंगे?

जिस दिन इन तीन सहोदरों की त्रासद रुखसती की खबर अखबारों में छपी, उसी दिन एक और सुर्खी थी- दिल्ली में आबकारी विभाग की आमदनी में पिछले वित्तीय वर्ष के दौरान 18 फीसदी का इजाफा हुआ। उसी रोज एक परदेसी वेबसाइट ने दावा किया कि एक भारतीय क्रिकेटर इंस्टाग्राम पर प्रति प्रायोजित पोस्ट 80 लाख रुपये से अधिक कमा लेते हैं। शायद उन्हें अफसोस हो कि वह अभी तक इस सूची के 17वें पायदान पर अटके हैं। हालांकि, मेरे अफसोस का अफसाना यहीं खत्म नहीं होता। बदनसीब बच्चियों की दूसरी पोस्टमार्टम रिपोर्ट शुक्रवार को आई। इसमें भी मौत की वजह वही थी- भूख। यह बात अलग है कि कुछ चिकने-चुपडे़ एंकर उसी वक्त जोश में सेंसेक्स के नए क्षितिज पर पहुंचने की जानकारी परोस रहे थे।
मदमस्त दिल्ली और सेंसेक्स की उछाल पर मुग्ध हमारे मुल्क को मंडावली की मौतों पर नजर डालने की सुधि कहां?

Leave a Reply