महागठबंधन की गांठें और बंधन Other, उपभोक्ता संरक्षण

पिछले दिनों कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को आगामी आम चुनाव में कांग्रेस का चेहरा तो घोषित किया ही गया, साथ ही उन्हें भाजपा विरोधी महागठबंधन के गठन के लिए भी अधिकृत किया गया। यानी अब महागठबंधन खड़ा करने की पूरी प्रक्रिया में राहुल गांधी केंद्रीय स्थिति में होंगे। कांग्रेस कार्यसमिति की उस बैठक में यह भी साफ कर दिया गया है कि भाजपा व एनडीए के खिलाफ बनने वाले किसी भी महागठबंधन का नेतृत्व कांग्रेस ही करेगी। इसके राजनीतिक निहितार्थ निकालें, तो दो बातें साफ होती हैं- एक, कांग्रेस ने सही समय पर पहल करते हुए क्षेत्रीय दलों को यह संदेश दे दिया कि राहुल गांधी और कांग्रेस के बिना कोई महागठबंधन बन नहीं सकता और उसकी धुरी सबसे बड़ा दल होने और अनेक राज्यों में आधार के कारण कांग्रेस ही होगी, साथ ही कांग्रेस अध्यक्ष उसके केंद्र में होंगे। कांग्रेस ने यह संदेश देकर छोटे क्षेत्रीय दलों के बीच महागठबंधन के स्वरूप को लेकर पलने व बढ़ने वाली अनिश्चितता को खत्म करने की कोशिश की है, तो दूसरी ओर ‘तीसरा मोर्चा’ जैसे बीच-बीच में उभरने वाले प्रयास कांग्रेस के इस कदम से कमजोर होंगे।
इस घोषणा के साथ कांग्रेस की एक चुनावी रणनीति भी पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम के आकलन के जरिए सामने आई है। वैसे, यह अभी कांग्रेस की आधिकारिक रणनीति नहीं है, लेकिन यह आकलन भविष्य की उसकी रणनीति को प्रभावित करेगा ही। यह रणनीति है कांग्रेस द्वारा अपने दम पर 150 और सहयोगी दलों के जरिए 150 सीटें जीतने की। कांग्रेस इसके लिए मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, असम, तेलंगाना जैसे राज्यों से 150 सीटें हासिल करने की कोशिश करेगी।
इस सबका अर्थ हुआ कि कांग्रेस के नेतृृत्व में जो महागठबंधन बनेगा, वह बहुत कुछ पिरामिड की शक्ल में होगा। यानी विभिन्न क्षेत्रीय दलों का ऐसा एक समुच्चय, जिसके लिए कांग्रेस को एक जोड़ने वाली शक्ति बनकर सामने आना होगा। कांग्रेस को ऐसा खाद-पानी बनना होगा, जिससे क्षेत्रीय दलों की चुनावी एकता या यूं कहें कि सरकार बनाने लायक एकता कायम हो सके। इस महागठबंधन में कांग्रेस के पक्ष में एक तरफ उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी, बिहार में राजद, कर्नाटक में जनता दल (एस) आधार तत्व का काम कर सकते हैं, तो दूसरी तरफ महाराष्ट्र में शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस जैसे दल हो सकते हैं, जो कांग्रेस पर थोडे़-बहुत दबाव बनाने के बाद महागठबंधन का हिस्सा बन सकते हैं। तीसरी तरफ, आंध्र प्रदेश की तेलुगू देशम पार्टी और महाराष्ट्र की शिवसेना जैसे दल हो सकते हैं, जो चुनाव बाद अपनी रणनीति तय कर किसी उपयुक्त गठजोड़ में जाने का फैसला करेंगे। जाहिर है, यह महागठबंधन अनेक अंतर्विरोधों के सामंजस्य सरीखा होगा, जिसमें अकुलाहटें, कुलबुलाहटें और टकराहटें उभरती तो रहेंगी, लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व वाले महागठबंधन ही उनके लिए एकमात्र विकल्प होगा। यह भी हो सकता है कि कई क्षेत्रीय दल किसी गठबंधन का हिस्सा न होकर चुनाव लड़ें और चुनाव के बाद अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी गठबंधन से जुड़ें।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी क्षेत्रीय दलों के नेताओं की निजी और सत्ता से जुड़ी महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रित कर उन्हें जनतांत्रिक महत्वाकांक्षाओं में तब्दील करना। दूसरी चुनौती होगी स्थानीय और राज्य स्तर पर आपस में टकराते क्षेत्रीय दलों और राज्य स्तर पर कांगे्रस के विरोध में खडे़ क्षेत्रीय दलों के साथ समन्वय बनाना। तीसरी चुनौती होगी, अब तक लगातार कांग्रेस विरोध की राजनीति करने वाले दलों, वामपंथियों और समाजवादियों को जोड़ना। इसके लिए कांग्रेस को अपने भीतर ऐसा अपार राजनीतिक धैर्य विकसित करना होगा, जिससे वह भविष्य में बनने वाले किसी महागठबंधन का नेतृत्व कर सके। सबसे महत्वपूर्ण बात होगी, गठजोड़ करने की प्रक्रिया में होने वाली सियासी हितों की सौदेबाजी को अत्यंत शांतिपूर्ण व कूटनीतिक ढंग से आगे बढ़ाना। शायद कांग्रेस इस चुनौती को समझ भी रही है, इसीलिए कांग्रेस कार्यसमिति में राहुल गांधी ने गलतबयानी या प्रक्रिया के बीच में बयानबाजी करके गठजोड़ और राजनीति की प्रक्रिया को क्षति पहुंचाने वालों से कड़ाई से निपटने का संदेश भी दिया है। उन्हें पता है कि रण सजने लगा है, सेनाएं इकट्ठी होने लगी हैं। इस वक्त धैर्य, शांति व कूटनीति तो चाहिए ही, साथ ही सेनाओं व सेनानायकों का दल भी चाहिए। यह लड़ाई चौतरफा है। एक तरफ, उन्हें नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी के व्यक्तित्व, कृतित्व और राजनीति से टकराना है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस को एक गतिवान और सबको साथ लेकर चलने वाले संगठन में तब्दील करना है 
और तीसरी तरफ, अनेक क्षेत्रीय दलों को जोड़कर अंतर्विरोधों में तालमेल बिठाना है। इसके अलावा, सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों द्वारा बनाई गई अपनी छवि को तोड़ना है। 
पार्टी के इस फैसले से इतना तो तय हो गया है कि 2019 की चुनावी रणभेरी का विपक्ष की तरफ से भी आगाज हो गया है। महागठबंधन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए कांग्रेस मुद्दों और विमर्शों की एक ऐसी बहस खड़ी करना चाहती है, जिसमें किसानों की आत्महत्या, कर्जमाफी के मुद्दे, युवाओं के रोजगार की समस्या, दलित व आदिवासियों में भेदभाव जैसे मुद्दों को उठाकर सत्ताधारी गठबंधन के खिलाफ ज्यादा से ज्यादा दलों को गोलबंद किया जाए। राहुल गांधी लगातार सरकार की आलोचना कर रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती इस आलोचना को जनता की भाषा में जनता के मन तक पहुंचाने की है, तभी महागठबंधन का प्रयोग किसी दिशा में बढ़ सकेगा। अगर यह जनभाषा का रूप न ले पाई, तो इससे कांग्रेस का जनाधार घटेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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